मंगलवार, 12 जनवरी 2010

नर्मदा और बचपन

नर्मदा से मेरी पहचान
माँ के द्वारा हुई । माँ की खोज ने मुझे नर्मदा से मिला दिया और अब मिलाया है तो ऐसा की ,लगता है मेरी माँ मुझे मिल गई ।
आज नर्मदा के किनारे पर बैठ मै अपनी सांसों की लय को जब सुनती हूँ तो अपने मै शांति से परिपूणं शक्ति का अहसास पाती हूँ
नर्मदा वह नदी है जो अभी तक न जाने कितने लोगों के पाप को धो चुकी है पर मैली नहीं हुई राम की गंगा तो राजकपूर नेआज से कई साल पहले गन्दी कर दी थी पर नर्मदा के किनारे की संगेमरमर की चट्टानों पर नर्गिस की लाल साड़ी का रंग ही लग पाया ।
नर्मदा खुद को बचा लेगी यह मेरा मानना है पर ..........?
हमे नर्मदा को क्रोध करने पर विवश नहीं करना चाहिए । हम जबलपुर वासी व भारत वासी समय रहते सचेत हो जाये तो बहुत अच्छा होगा
इन बच्चों के लिए नर्मदा रोजगार का साधन है ,पेट की आग को बुझाने का एक जरिया है । ठंड हो या बरसात किसी भी मोसम में यह बच्चे और भी इनके भाएबंधू दीनदुनिया से बेखबर अपने काम का आनंद लेते हुए मिलेगे ।
तो आज मेरे इस चित्र के साथ हम सब एक प्रयास करे नर्मदा और बचपन बचने का ।
अगली पोस्ट में फिर मिलेगे नर्मदा के साथ ,बचपन के साथ ,अपनों के साथ ,परायों के साथ ,जीवो के साथ ,निर्जीवों के साथ और आपके साथ ।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई नर्मदा दिव्या हैं. आपका चित्र भी जीवन की कडियो को आपस में जोड़ता नजर आ रहा हैं. परन्तु राजकपूर के गंगा को मैला करने की बात समझ नहीं आई. विस्तार में लिखे तो अच्छा लगेगा

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  2. हमारा तो बचपन से जवानी तक का समय इसी नर्मदा में तैरते जिलहरी घाट पर बीता!!

    नमन है माँ नर्मदे को इस जबलपुर संस्कारधानी के पुत्र का.

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