गुरुवार, 14 जनवरी 2010

संक्रांति पर्व पर ब्लॉग की दुनिया वालों को शुभकामनाये





























आज संक्रांतिपर्व पर शुभकामनाये एवं आप सभी को हम संस्कारधानी वासियों की तरफ से संक्रांति मेले पर निमंत्रित करते है ।







मेले कुम्भ का आज प्रथम दिन था । मै आप सभी को अपने जबलपुर के नर्मदा घाटों के मेले के कुच्छ सजीव चित्रों व घटनाओं से अवगत करोंगी । मैंने ३३ वर्षों मै पहला मेला देखा है मुझे अच्छा लगा । किताबों में व फिल्मो में पढ़ा व देखा था पर सजीव नहीं देखा था आज यह संभव हो पाया । मै भीड़ से हमेशा दूर रहीहूं यही कारण था की मैंने आज तक कोई मेला नहीं देखा ,पर आज की भीड़ मुझे अच्छी लगी । आज चरितार्थ हो रहा था की धरम व ईश्वर का डर अभी जनमानस मै है (यह डर हमेशा बना रहे ) जबलपुर व विश्व ही ठंड व शीत लहर के प्रकोप को झेल रहा है इस कारण सूर्योदय के समय भीड़ थी पर कम । धीरे धीरे सूर्य के बढ़ते तापमान के साथ लोगों की भीड़ ने जन सैलाब का रूप ले लिया ।







आज नर्मदा के तट पर विशालजन सैलाब दिखाई दे रहा था । तकरीबन ४५ से ५० हजार तक लागों ने नर्मदा में नहाकर स्वर्ग में अपना स्थान निश्चित किया (शाश्त्रों के अनुसार ) और संक्रांति पर्व का आनन्द उठाया । प्रातः काल नर्मदा के जल से भाप निकल रही थी धुंध ने सम्पुर्ण नर्मदा के तटों को अपनी आगोश में ले रखा था । मै लेखक ,कविताकार नहीं हूँ इस कारण हो सकता है की मेरे शब्द सम्पुर्ण सोंदर्य को व्यक्त नहीं कर पारहे हों इस कारण मैने अपने कैमरे की मदद ली है ।







नर्मदा , कैमरा और मेरा भाई इस मेले में मेरे साथ रहे ।







मेले में जबलपुर की जनता ,शासन व पुलिस प्रशासन की भूमिका सराहनीय है । जगह जगह विशाल भंडारे का आयोजन किया गया है , कुछ समितियों ने शरबत की व्यवस्था की है ,तकरीबन १००० पोलिस कर्मी लगे है ,महिला पोलिस कर्मी भी लगे है







रामपुर chauk से सड़क के दोनों तरफ तरह तरह के सामानों की दुकाने लगी हुई है इस मै आप को नहाने के लिए मग ,टावेल ,अंडरवियर ,आदि (यदि आप अचानक ही नर्मदा की तरफ निकल पड़े है तो कोई बात नहीं रस्तेमै आप को सब मिल जायेगा ) पूजा की सामग्री , बच्चो के खिलौने , सब्जी , घर ग्रहस्ती का पूरा सामान आप को मिल जायेगा ।







यदि आप को अपने किसी का नाम अपने हाथ पर गुदवाना है (गुदना गुदवाना या वर्त्तमान बीhasha में कहे तो टेटू , लिखवाना है तो इस की भी पूरी व्यवस्था है आज के लिए इतना ही ।







यह लिखते समय मुझे अपना प्राथमिक शाला का इम्तहान याद आ रहा है जब मै मेले पर निबंध को याद करके लिखती थी , osi समय से ही मेले का चित्रण मेरे बिमाग में बना हुआ था जिसे मेने आज सच पाया ।







आप सभी आमंत्रित है संस्कार धानी मै .......................

बुधवार, 13 जनवरी 2010

दोस्त या दुश्मन


दोस्त बनाने मै भी उतनी ही कठनाई होती है जीतनी की दुश्मन बनाने में और दोस्त उतनी ही सरलता से बन जाते है जीतनी सरलता से दुश्मन
तकलीफ या परेशानी ,मेहनत तो दोस्ती और दुश्मनी निंभाने में होती है

दोस्त से ज्यादा दुश्मन रखने चाहीये क्यों की दोस्त "कुछ" काम ईमानदारी से नहीं कर सकते और उनका यह व्यवहार तकलीफदायक होता है हम किसी भी तरह अपने आप को तसल्ली नहीं दे पाते ।
परन्तु
यही "कुछ" काम दुश्मन करे तो दील को तसल्ली दी जा सकती है यह कहकर की वह तो दुश्मन था उससे यही उम्मीद भी यही थी तो
दोस्त ज्यादा अच्छे है की दुसमन .....?
मेरा मन्ना है की
दोस्त और दुश्मन दोनों ही रिश्तों के नाम है और रिश्ते सभी अच्छे होते है बस उन्हें ईमानदारी से बनाने जीने की जरुरत है
तो आज हम फिर से रिश्तों के लिए ईमानदार होते हुएँ उन्हें जीना सीखे
आने वाले कल मै जिसतरह सूर्य आपनी दिशा बदलेगा उसी तरह सभी के रिश्तों मै सकारात्मक परिवर्तन आएगा मेरे साथ आप सभी भी यह प्राथना करे

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

नर्मदा और बचपन

नर्मदा से मेरी पहचान
माँ के द्वारा हुई । माँ की खोज ने मुझे नर्मदा से मिला दिया और अब मिलाया है तो ऐसा की ,लगता है मेरी माँ मुझे मिल गई ।
आज नर्मदा के किनारे पर बैठ मै अपनी सांसों की लय को जब सुनती हूँ तो अपने मै शांति से परिपूणं शक्ति का अहसास पाती हूँ
नर्मदा वह नदी है जो अभी तक न जाने कितने लोगों के पाप को धो चुकी है पर मैली नहीं हुई राम की गंगा तो राजकपूर नेआज से कई साल पहले गन्दी कर दी थी पर नर्मदा के किनारे की संगेमरमर की चट्टानों पर नर्गिस की लाल साड़ी का रंग ही लग पाया ।
नर्मदा खुद को बचा लेगी यह मेरा मानना है पर ..........?
हमे नर्मदा को क्रोध करने पर विवश नहीं करना चाहिए । हम जबलपुर वासी व भारत वासी समय रहते सचेत हो जाये तो बहुत अच्छा होगा
इन बच्चों के लिए नर्मदा रोजगार का साधन है ,पेट की आग को बुझाने का एक जरिया है । ठंड हो या बरसात किसी भी मोसम में यह बच्चे और भी इनके भाएबंधू दीनदुनिया से बेखबर अपने काम का आनंद लेते हुए मिलेगे ।
तो आज मेरे इस चित्र के साथ हम सब एक प्रयास करे नर्मदा और बचपन बचने का ।
अगली पोस्ट में फिर मिलेगे नर्मदा के साथ ,बचपन के साथ ,अपनों के साथ ,परायों के साथ ,जीवो के साथ ,निर्जीवों के साथ और आपके साथ ।

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साया


मै जहाँ जहाँ चलूंगी मारा साया साथ होगा ।
मै जीधर को रुख करुँगी वो..................?

परछाई

मेरा समय अच्छा चल रहा है ।
कहते है की बुरे समय में परछाई भी साथ नहीं देती

रविवार, 3 जनवरी 2010